Tuesday, August 15, 2017

                  राम कथा 
अयोध्या जंक्शन से ट्रेन चलने के कुछ देर बाद सामने वाली सीट पर श्रीराम आकर बैठ गये। अरूण गोविल से मिलता-जुलता चेहरा देख मैंने पहचान लिया। कपड़े सामान्य ही थे पर मुख का तेज देवताओं वाला था। मैंने करबद्ध प्रणाम किया तो खिन्न चेहरे पर थोड़ी देर के लिए शांति आयी और आशिष के लिए हाथ उठा दिये। फिर बड़े निराश मन से पटरियों के तरफ देखने लगे।
मैंने पूछा "प्रभु! कहां जा रहे हैं?
" ज्यादा कोच़न न करो। चुपचाप जो मांगना है मांगो और निकलो। "
" प्रभु आप मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। आपके मुख मंडल पर क्रोध के भाव शोभा नहीं देता। "
" क्या बक रहे हो? सीधे-सीधे न बोल सकते हो? "
" सर! खिसिया काहे रहे हैं? मैं तो पूछ रहा था कि झोला उठाकर कहा चल दिए? "
"अयोध्या छोड़कर जा रहा हूँ। " चेहरे पर दृढ़ता का भाव लाते हुए भगवान् बोलें।
"अरे नहीं! अब काहे? मम्मी-पापा तो है नहीं, फिर?"
भगवान् मायूस होते चले गए। मैंने बात बदलना ठीक समझा पूछा कि आप कहां जा रहे हैं?
"पहले मुगलसराय जाएगें फिर वही से दूसरी ट्रेन ले लेंगे। चित्रकूट के लिए अयोध्या से कोई डायरेक्ट ट्रेन नहीं है न।"
"आपको पता नहीं है सर? मुगलसराय अब दीनदयाल हो गया है?"
"हमको मुगलसराय भी कहां पता था? वहां तो घनघोर जंगल था जो अब नहीं है। तुम उसे मुगलसराय कहो या कुछ भी।"
"सर लक्ष्मण नहीं आयें?"
"चिढ़ा रहा है? बोले न कि ज्यादा कोच़न किया तो करेजा में तीर भोंक देंगे।" फिर थोड़ा गंभीर और गमगीन होकर बोलें "लक्ष्मण बोला कि उसपर जनता की जिम्मेदारी है, विकास के लिए संघर्ष करना हैं।"
"भरत ने भी नहीं रोका?"
"भरत ने कहा कि गद्दी सेवा के लिए है........ "
" रहने दीजिए सर, हम समझ गए। यह डायलॉग अभी बिहार में चर्चित हुआ था।" माहौल संजीदा देख, मैंने बीच में ही रोक दिया।
"सर मैं चलूँ साथ में?"
"नहीं! मुझे तुमलोगों पर भरोसा नहीं रहा। "
" सर,  आप जा क्यु रहे हैं? कहीं भव्य राममंदिर न बनने का दुख तो नहीं?मतलब आवासीय सुविधा का अभाव तो नहीं?"
"नहीं बे।" आंखें तरेरते हुए बोलें।
मैं सहम कर चुप हो गया। फिर भगवान् शांत होकर बोले - "यहां इतना ज्यादा मंदिर हैं कि सकान नहीं है सब जगह जाना। उपर से तुमलोग तो पार्टी- पॉलिटिक्स में जनता का प्यार भी छीन रहे हो। कहां निर्विरोध नेता थे, अब तो एक शक्तिशाली विपक्ष मेरे खिलाफ है। साथ में तो केवल वानर सेना रह गया है। जिसके अक्ल को तो जानते ही हो। बस उछल-कूद मचाते रहता है। तर्कवान - विद्वान तो विपक्षी होने के कारण मुझ पर ही प्रश्न उठाने लगे हैं।"
अब भगवान् की आंखें छलक रही थी। गला मेरा भी भर आया था। मैं और प्रश्न नहीं पाया और करवट बदल कर सो गया।

                                                -अविनाश गौरव

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