Tuesday, September 18, 2018

           मोदियाबिन्द

अब जुम्मन चाचा घर कम आते हैं
जब से उन्हे मोदियाबिन्द हुआ है
लोगो मे धूम भले बहुत हैं
रिश्तो मे रौनक कम गया हैं
हैरान है रंग केसरिया भी
कब मोहक रंग फीका पर गया
कुछ लोग इतने उत्तेजित है कि
उसने हरा रंग भी छुपा लिया है
अब जुम्मन चाचा घर कम आते हैं
जब से उन्हे मोदियाबिन्द हुआ है |

स्याह रंग से आँख मूंद लिए
सब चकाचौंध से भयभीत लग रहे
हम जबाब देने को इतने उतारू
कि मूल सवाल ही धरा रह गया
जो जबाब मांगता है आज भी
उसका उत्तर लफेबाजी
हमें यकीं है मेरा कुछ नही लूटा
पर जुम्मन चाचा यकीं करें तो कैसे
चार साल का बेटा, नादान बहन, बूढ़ी माँ
घर-दुकान, दीन-ईमान
कुछ भी तो नहीं भूले
 अब जुम्मन चाचा घर कम आते हैं
जब से  उन्हे मोदियाबिन्द हुआ है

AVINASH GAURAV

Tuesday, August 15, 2017

                  राम कथा 
अयोध्या जंक्शन से ट्रेन चलने के कुछ देर बाद सामने वाली सीट पर श्रीराम आकर बैठ गये। अरूण गोविल से मिलता-जुलता चेहरा देख मैंने पहचान लिया। कपड़े सामान्य ही थे पर मुख का तेज देवताओं वाला था। मैंने करबद्ध प्रणाम किया तो खिन्न चेहरे पर थोड़ी देर के लिए शांति आयी और आशिष के लिए हाथ उठा दिये। फिर बड़े निराश मन से पटरियों के तरफ देखने लगे।
मैंने पूछा "प्रभु! कहां जा रहे हैं?
" ज्यादा कोच़न न करो। चुपचाप जो मांगना है मांगो और निकलो। "
" प्रभु आप मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। आपके मुख मंडल पर क्रोध के भाव शोभा नहीं देता। "
" क्या बक रहे हो? सीधे-सीधे न बोल सकते हो? "
" सर! खिसिया काहे रहे हैं? मैं तो पूछ रहा था कि झोला उठाकर कहा चल दिए? "
"अयोध्या छोड़कर जा रहा हूँ। " चेहरे पर दृढ़ता का भाव लाते हुए भगवान् बोलें।
"अरे नहीं! अब काहे? मम्मी-पापा तो है नहीं, फिर?"
भगवान् मायूस होते चले गए। मैंने बात बदलना ठीक समझा पूछा कि आप कहां जा रहे हैं?
"पहले मुगलसराय जाएगें फिर वही से दूसरी ट्रेन ले लेंगे। चित्रकूट के लिए अयोध्या से कोई डायरेक्ट ट्रेन नहीं है न।"
"आपको पता नहीं है सर? मुगलसराय अब दीनदयाल हो गया है?"
"हमको मुगलसराय भी कहां पता था? वहां तो घनघोर जंगल था जो अब नहीं है। तुम उसे मुगलसराय कहो या कुछ भी।"
"सर लक्ष्मण नहीं आयें?"
"चिढ़ा रहा है? बोले न कि ज्यादा कोच़न किया तो करेजा में तीर भोंक देंगे।" फिर थोड़ा गंभीर और गमगीन होकर बोलें "लक्ष्मण बोला कि उसपर जनता की जिम्मेदारी है, विकास के लिए संघर्ष करना हैं।"
"भरत ने भी नहीं रोका?"
"भरत ने कहा कि गद्दी सेवा के लिए है........ "
" रहने दीजिए सर, हम समझ गए। यह डायलॉग अभी बिहार में चर्चित हुआ था।" माहौल संजीदा देख, मैंने बीच में ही रोक दिया।
"सर मैं चलूँ साथ में?"
"नहीं! मुझे तुमलोगों पर भरोसा नहीं रहा। "
" सर,  आप जा क्यु रहे हैं? कहीं भव्य राममंदिर न बनने का दुख तो नहीं?मतलब आवासीय सुविधा का अभाव तो नहीं?"
"नहीं बे।" आंखें तरेरते हुए बोलें।
मैं सहम कर चुप हो गया। फिर भगवान् शांत होकर बोले - "यहां इतना ज्यादा मंदिर हैं कि सकान नहीं है सब जगह जाना। उपर से तुमलोग तो पार्टी- पॉलिटिक्स में जनता का प्यार भी छीन रहे हो। कहां निर्विरोध नेता थे, अब तो एक शक्तिशाली विपक्ष मेरे खिलाफ है। साथ में तो केवल वानर सेना रह गया है। जिसके अक्ल को तो जानते ही हो। बस उछल-कूद मचाते रहता है। तर्कवान - विद्वान तो विपक्षी होने के कारण मुझ पर ही प्रश्न उठाने लगे हैं।"
अब भगवान् की आंखें छलक रही थी। गला मेरा भी भर आया था। मैं और प्रश्न नहीं पाया और करवट बदल कर सो गया।

                                                -अविनाश गौरव

Saturday, November 26, 2016

मुर्गा बनो

मुर्गा बनना एक मुहावरा है जिसके दो अर्थ है। एक तो यह है कि किसी के द्वारा मुर्ख बना दिया जाना, ठगा जाना और दूसरा आशय सुबह के संकेतक बनना , सचेतक होना । हालांकि अब मुर्गे के बांग पर कम ही लोग जगते है फिर भी आधुनिक उपकरणों के अलार्म में भी मुर्गा का बांग सुना जा सकता है। एक और मुर्गा बनना होता है, जो हम स्कूल के दिनों में बनते थे, सबक न याद करने के सजा के तौर पर।
   आज समाज पर गौर करने पर लगता है कि हम कई अर्थों में मुर्गा बन रहे हैं। हमे पहले वाला ‘ मुर्गा बनना ‘ ही ज्यादा दिखता है। सचेतक कम ही है जो लोगो को नींद से जगाए। यह कहना, ( मेरे लिए ) अतिश्योक्ति होगा कि मानसिक विंकलांगता का ऐसा दौर पहले नहीं देखा है जो बेचैनी और उब पैदा करता है। लोग इतने विचारहीन हो गए है कि उन्हें अपने समर्थन और विरोध का कारण ही नहीं पता।
    कल एक रिक्शा वाले से बात हुए, उसका नाम मो. आबिद था । मैं अक्सर लोगों से विभिन्न मुद्दो पर राय जानने का प्रयास करता हूँ। पिछले दस दिनों में, विमुद्रीकरण परिणामों के कारण हुए आर्थिक क्षति से वह आहत था। उसने बताया कि उसके कुछ साथी, जो दिहाड़ी मजदूर थे। काम न मिलने के कारण भूखे सो रहे थे और वो अपने-अपने गाँव वापस जा चुके है। समझने की बात है कि वहाँ भी उनके हालात बेहतर नहीं ही होगें। हाँ ! तंगी में अपने परिवार के साथ मिलकर इससे जुझ रहे होगें । इन सब के बाद भी आबिद इसके जूझ रहे होगें। इन सब के बाद भी आबिद इसके पक्षधर था । उसने कहा – ‘ काला धन खत्म हो जाएगा। इसे अपनी तकलीफो को नियती मानने के संदर्भ में समझा जा सकता है। यह सदियों से होते आ रहा है। मजदूरों को और मजबूरों को कर्मवाद के टोटके में ढ़ाल दिया जाता है कि ताकि वह प्रश्न न करे , तर्क न करे, संघर्ष न करे। क्या यह समय नहीं है कि मानसिक उपनिवेश की इस दशा को तोड़ा जाए। मृतो को जिलाया जाए, सोए को जगाया जाए। हम सत्ता और शासक का विरोध करते-करते उसके वयक्तित्व को बड़ा ही करते है। जरुरत है मुर्गा बनने का ( दूसरा वाला ) और मुर्गा बनाने का ( तीसरा वाला ) चिंतनशीलो को बौद्धिक जुगाली से आगे बढ़कर गरीब-मजदुरों से संवाद स्थापित करना चाहिए। जिसके लिए लड़ना है उसके सहभागिता के बिना संघर्ष संभव नहीं है। जागृत नागरिक समाज का प्रतिवाद सत्ता को सबक याद दिलाएगा, उसे मुर्गा बनाएगा।

Sunday, June 16, 2013

वो मेरा था... वो मुझ सा था...

आज का था नवजवान
बात में और कर्म में सोचता था
केवल वर्तमान...
जीता था उन्मुक्तता से
जीवन वसंत की तरह
हर घड़ी  था उसके लिए
एक नई  घड़ी  की तरह...
दरिया का वो मौज था
अपनी जिद ही जिन्दगी
ख्वाहिश के हर कश  को पीता
दिलकशी की तरह ।



लड़कियों का शौक  रखता
जो आज  दिवाने  रखते हैं
प्यार उसका भी वही था
जो आज दिवाने  करते है...
लड़कियो का शौक लड़कों से कमतर नहीं
प्यार की  समझ उनमें लडको से बेहतर नहीं
शौक -ऐ- जुनून ने उसे ममता का तोहफा दिया
जो चाहती है हर आंचल  उसने वो ठुकरा दिया
उस मदहोशी  के भूल को
उसने मिटा दिया उस फूल को  ।



माँ में ममता थी नहीं
पर बाप व्यग्र हो उठा
उसे अंतहीन अफसोश  था कि
वो न उठा  सका जिम्मेदारी के बोझ को
न थपका सका अपनी गोद को
किसे भागे, किसको पुकारे
वो मर्द था कैसे दहारे
रोते हुए उसने कहा
वो मेरा था वो मुझसा था ।

Monday, April 15, 2013

पहचान का संकट

सरकार  ओर  वयवस्था  विरोधी  हिँसक  जनाक्रोश के पीछे पहचान का संकट
ओर आत्मसम्मान का प्रश्न भी शामिल है l उदहारण के तौर पर मणिपुर का एक
तबका अपने देसी व विशिष्ट पहचान को बनाये रखने के प्रति खासा संवेदनशील
है l वे मणिपुर में सशस्त्र बलों  के तैनाती ओर आम आदमी विशेषकर महिलाओ
के साथ सशस्त्र बलों  के दुर्व्यवहार को आर्थिक रूप से सबल कौम द्वारा कमजोर
कौम को दबाने के रूप में देखते है l लगभग इसी तरह की स्थिति बिहार , झारखण्ड ,
छत्तीसगढ़ आदि  राज्यों में दलित ,पिछड़ी जातियों और गरीब लोगों के साथ सामंती
तत्वों एवं अमीर लोगों द्वारा की जाती है l ऐसे में आत्मसम्मान एवं पहचान का प्रश्न
स्वाभाविक रूप से बड़ा हो जाता है l
अब सवाल यह है कि सरकार  एवं व्यवस्था के हथियारबंद विरोध को क्या माना
जाये ? यक़ीनन एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हिंसात्मक विरोध को कतई  सही
नहीं माना जा सकता है लेकिन इसे दुश्मनी से प्रेरित एक राष्ट्रद्रोही कार्यवाही मानकर
ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता l गरीबी, बेरोजगारी , ओर विकास के लाभों से
वंचित तथा स्वतंत्र पहचान व सम्मान की चाहत रखने वाले लोगो के विरोध को
केवल हिंसा के आधार पर बेकार नही ठहराया जा सकता क्योंकि ये विरोध यदि
बेमतलब ओर फिजूल होते तो इतने लम्बे समय तक इसका टिके रहना मुश्किल होता l
जाहिर है इनहे जनता का कम या ज्यादा नैतिक समर्थन हासिल है l

Sunday, April 14, 2013

जीवन और सत्य से रहीत

कमजोर  होना  दुनिया  का  सबसे बड़ा  पाप  है1 कमजोरी मृत्यु  के  समान  है 1
सत्य  का  यही एक मन्त्र  है -जो भी चीज  अप  को शारीरिक , बौद्धिक एवं आत्मिक
स्तर पर दुर्बल बनाती है वह आपके लिए जहर है, वह जीवन ओर सत्य से रहित है ...........

विवेकानंद