मुर्गा बनना एक मुहावरा है जिसके दो अर्थ है। एक तो यह है कि किसी के द्वारा मुर्ख बना दिया जाना, ठगा जाना और दूसरा आशय सुबह के संकेतक बनना , सचेतक होना । हालांकि अब मुर्गे के बांग पर कम ही लोग जगते है फिर भी आधुनिक उपकरणों के अलार्म में भी मुर्गा का बांग सुना जा सकता है। एक और मुर्गा बनना होता है, जो हम स्कूल के दिनों में बनते थे, सबक न याद करने के सजा के तौर पर।
आज समाज पर गौर करने पर लगता है कि हम कई अर्थों में मुर्गा बन रहे हैं। हमे पहले वाला ‘ मुर्गा बनना ‘ ही ज्यादा दिखता है। सचेतक कम ही है जो लोगो को नींद से जगाए। यह कहना, ( मेरे लिए ) अतिश्योक्ति होगा कि मानसिक विंकलांगता का ऐसा दौर पहले नहीं देखा है जो बेचैनी और उब पैदा करता है। लोग इतने विचारहीन हो गए है कि उन्हें अपने समर्थन और विरोध का कारण ही नहीं पता।
कल एक रिक्शा वाले से बात हुए, उसका नाम मो. आबिद था । मैं अक्सर लोगों से विभिन्न मुद्दो पर राय जानने का प्रयास करता हूँ। पिछले दस दिनों में, विमुद्रीकरण परिणामों के कारण हुए आर्थिक क्षति से वह आहत था। उसने बताया कि उसके कुछ साथी, जो दिहाड़ी मजदूर थे। काम न मिलने के कारण भूखे सो रहे थे और वो अपने-अपने गाँव वापस जा चुके है। समझने की बात है कि वहाँ भी उनके हालात बेहतर नहीं ही होगें। हाँ ! तंगी में अपने परिवार के साथ मिलकर इससे जुझ रहे होगें । इन सब के बाद भी आबिद इसके जूझ रहे होगें। इन सब के बाद भी आबिद इसके पक्षधर था । उसने कहा – ‘ काला धन खत्म हो जाएगा। इसे अपनी तकलीफो को नियती मानने के संदर्भ में समझा जा सकता है। यह सदियों से होते आ रहा है। मजदूरों को और मजबूरों को कर्मवाद के टोटके में ढ़ाल दिया जाता है कि ताकि वह प्रश्न न करे , तर्क न करे, संघर्ष न करे। क्या यह समय नहीं है कि मानसिक उपनिवेश की इस दशा को तोड़ा जाए। मृतो को जिलाया जाए, सोए को जगाया जाए। हम सत्ता और शासक का विरोध करते-करते उसके वयक्तित्व को बड़ा ही करते है। जरुरत है मुर्गा बनने का ( दूसरा वाला ) और मुर्गा बनाने का ( तीसरा वाला ) चिंतनशीलो को बौद्धिक जुगाली से आगे बढ़कर गरीब-मजदुरों से संवाद स्थापित करना चाहिए। जिसके लिए लड़ना है उसके सहभागिता के बिना संघर्ष संभव नहीं है। जागृत नागरिक समाज का प्रतिवाद सत्ता को सबक याद दिलाएगा, उसे मुर्गा बनाएगा।
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