Monday, April 15, 2013

पहचान का संकट

सरकार  ओर  वयवस्था  विरोधी  हिँसक  जनाक्रोश के पीछे पहचान का संकट
ओर आत्मसम्मान का प्रश्न भी शामिल है l उदहारण के तौर पर मणिपुर का एक
तबका अपने देसी व विशिष्ट पहचान को बनाये रखने के प्रति खासा संवेदनशील
है l वे मणिपुर में सशस्त्र बलों  के तैनाती ओर आम आदमी विशेषकर महिलाओ
के साथ सशस्त्र बलों  के दुर्व्यवहार को आर्थिक रूप से सबल कौम द्वारा कमजोर
कौम को दबाने के रूप में देखते है l लगभग इसी तरह की स्थिति बिहार , झारखण्ड ,
छत्तीसगढ़ आदि  राज्यों में दलित ,पिछड़ी जातियों और गरीब लोगों के साथ सामंती
तत्वों एवं अमीर लोगों द्वारा की जाती है l ऐसे में आत्मसम्मान एवं पहचान का प्रश्न
स्वाभाविक रूप से बड़ा हो जाता है l
अब सवाल यह है कि सरकार  एवं व्यवस्था के हथियारबंद विरोध को क्या माना
जाये ? यक़ीनन एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हिंसात्मक विरोध को कतई  सही
नहीं माना जा सकता है लेकिन इसे दुश्मनी से प्रेरित एक राष्ट्रद्रोही कार्यवाही मानकर
ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता l गरीबी, बेरोजगारी , ओर विकास के लाभों से
वंचित तथा स्वतंत्र पहचान व सम्मान की चाहत रखने वाले लोगो के विरोध को
केवल हिंसा के आधार पर बेकार नही ठहराया जा सकता क्योंकि ये विरोध यदि
बेमतलब ओर फिजूल होते तो इतने लम्बे समय तक इसका टिके रहना मुश्किल होता l
जाहिर है इनहे जनता का कम या ज्यादा नैतिक समर्थन हासिल है l

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