Sunday, June 16, 2013

वो मेरा था... वो मुझ सा था...

आज का था नवजवान
बात में और कर्म में सोचता था
केवल वर्तमान...
जीता था उन्मुक्तता से
जीवन वसंत की तरह
हर घड़ी  था उसके लिए
एक नई  घड़ी  की तरह...
दरिया का वो मौज था
अपनी जिद ही जिन्दगी
ख्वाहिश के हर कश  को पीता
दिलकशी की तरह ।



लड़कियों का शौक  रखता
जो आज  दिवाने  रखते हैं
प्यार उसका भी वही था
जो आज दिवाने  करते है...
लड़कियो का शौक लड़कों से कमतर नहीं
प्यार की  समझ उनमें लडको से बेहतर नहीं
शौक -ऐ- जुनून ने उसे ममता का तोहफा दिया
जो चाहती है हर आंचल  उसने वो ठुकरा दिया
उस मदहोशी  के भूल को
उसने मिटा दिया उस फूल को  ।



माँ में ममता थी नहीं
पर बाप व्यग्र हो उठा
उसे अंतहीन अफसोश  था कि
वो न उठा  सका जिम्मेदारी के बोझ को
न थपका सका अपनी गोद को
किसे भागे, किसको पुकारे
वो मर्द था कैसे दहारे
रोते हुए उसने कहा
वो मेरा था वो मुझसा था ।

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